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कभी
ये
तीनो
शब्द
मुझे
भी
बहुत
प्रिय
थे ,
सर
पे
लहलहाती
खेती
पे
मुझ
को
था
अभिमान ,
याद
है
कैसे
प्यार
से
मेरे
बालो
पे
हाथ
फेरती
थी ,
हर
पार्टी
मैं
बालो
की
तारीफ
करते
थे
यार ,
कोई
मुझे
ऋतिक
तो
कोई
संजय
द्त्त
पुकारता ,
याद
है
वो
मनहूस
घड़ी, बुरा
हुआ
था
मेरा
हाल ,
एक-एक
कर
लगे
थे
गिरने, मेरा
सर
रहे
थे
छोड़ ,
मेरे
तो
होश
उड़
गये
तब
लोगो
से
ली
राय ,
दही,
माखन
,शहद,
नीबू
सब
कुछ
बालो
मैं
लगाया ,
जड़ी-बूटी,दवाई
और
लगाए
कई
सारे
तेल ,
मेरा
तो
चेहरा
बदल
गया
और
आया
नया
रूप ,
अपनो
ने
अनदेखा
किया
,गर्लफ्रेंड
ने
भी
छोड़ा
शुभचिंतको
ने
खूब
समझाया,कहा
ना
लो
टेंशन,
कई
गंजे
हीरो
की
दिखा
के
फोटो
मन
मेरा
बहलाते ,
मैने
चंद
दिनों
में
ही
अपना
सब
कुछ
खोया ,
समझ
ले
प्यारे
एक
बार
जो
फसल
ये
कट
जाती ,
आओ
बताऊ
एक
बात
,जो
मेरे
दादी
मुझे
बतलाती , Updated: Sep-2010 |
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