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ऑफीस
में
ये
रोब
जमाते,
गरज-गरज
चिल्लाते
एक
दिन
भरी
मीटिंग
में,
आ
रहा
इन्हे
पसीना मन
में
हो
रही
उथल
-पुथल,
सोचा
की
पता
लगाऊ
जा
पहुँचा
बॉस
के
घर
और
घंटी
बजाई
मेरी
भी
सास
रुक
गयी
और
पाँव
लगे
थे
हिलने
पर
जुटा
के
सारी
हिम्मत,
फिर
दरवाज़ा
खटखटाया
दरवाजा
खुला
तो
सामने
खड़े
थे
मेरे
सर
बोले
कैसे
हो
क्यो
आए
क्या
हो
गयी
बात
मैं
भी
पूरा
सोच
के
आया,
के
ना
आऊंगा
बाज
कहा
सर
जी
ना
कोई
बात
ना
कोई
फरियाद
बाते
कर
के
यहा
-वहां
की,
मैं
बना
रहा
था
राय
बॉस
मेरे
सकपकाये
यहा
-वहां
थे
झाके
सोचा
हम
पर
रोब
जमाए,
खूब
खेले
खेल
ऑफीस
मैं
रहे
टिप-टॉप,
घर
में
पहने
कपड़े
मैला Updated: Aug-2010 |
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