लेते
तेरा
नाम,
केवल
सुबह
शाम
जी,
दिन
भर
करते,
उलटे
हम
काम
जी
श्रद्धा
हमारी
रत्ती,
भर
कामनाएं
भर
गोदाम जी,
तब
कैसे
बने,
बिगड़े
काम
हे
राम
जी
मन
भर
खीर
में
दूध
सिर्फ
पचास
ग्राम
जी
फिर
भी
कहते
है
बेकार
है
राम
नाम
जी
बड़-चढ़ चर्चा करते
,लड़ते
तेरे लिए हर खास-ओ- आम
जी
भरे
क्रोध
से
छेड़ें
छोटी
छोटी
बातों
पे
संग्राम
जी
याद न किसी को, आखिर को
पहुचना तेरे
धाम
जी
बड़ा
भगत
हूँ
मैं
,बड़ा
ही
निष्काम
जी
पर
हैं
ऐसे अहम्
के
भरे
जाम
जी
दिखे शांत
मगर
मन
में
न
आराम
जी
खोजते फिरें
तुम्हे
घर
घर
ग्राम
जी
फिर
भी
नहीं
मिलते
तुम
राम
जी
छोड़ो इस
झूठी
आनबान
को
जी
राम
न
मिलते
कभी
बन्दे
बेईमान
को
जी
राम
जी
तो
पकड़ते
उसी
का
हाथ
हैं
जी
जो
देता
लाचार
और
असहाय
का
साथ
जी
रखे
जो
दया
का
भाव
और
करे
परमार्थ
जी
बक्श
लो
तुम
मुझे
हे
राम
जी
बिक्रम नाम
में
तो
बसे
हो,
बसो
मेरे रोम
जी